आत्मविचार: खुद से मिलने की शुरुआत

हम पूरी ज़िंदगी बाहर जवाब खोजते रहते हैं —
लोगों में, किताबों में, हालातों में।

लेकिन सबसे ज़रूरी सवाल
हम खुद से कभी नहीं पूछते।

मैं कौन हूँ?
मैं जो सोच रहा हूँ, क्या वो सच में मेरा है?
या बस सीखी हुई धारणाएँ हैं?

Current image: alone but calm

आत्मविचार कोई किताब नहीं,
कोई प्रवचन नहीं,
बल्कि खुद के साथ ईमानदार होने की कला है।

जब हम चुप बैठकर अपने विचारों को देखते हैं,
तो धीरे-धीरे सच सामने आने लगता है।

शोर के पीछे छिपा हुआ मन,
और मन के पीछे छिपा हुआ सत्य।

यही यात्रा है —
बाहर से भीतर की ओर।

शायद जवाब बाहर नहीं,
हमारे भीतर ही है।

आत्मविचार का अर्थ है खुद को जानना। अद्वैत वेदांत के अनुसार मैं शरीर या मन नहीं, बल्कि शुद्ध चेतना हूँ।

मैं शरीर नहीं हूँ,
क्योंकि शरीर बदलता है।

मैं मन नहीं हूँ,
क्योंकि मन आता–जाता है।

मैं विचार नहीं हूँ,
क्योंकि विचार देखे जा सकते हैं।

तो फिर मैं कौन हूँ?

अद्वैत कहता है —
जो बदलता नहीं,
जो देख रहा है,
वही मैं हूँ।

दुःख तब पैदा होता है
जब देखने वाला
अपने देखे हुए से
अपने आप को जोड़ लेता है।

शरीर मेरा है,
पर मैं शरीर नहीं हूँ।
मन मेरा है,
पर मैं मन नहीं हूँ।

यह जानना ज्ञान नहीं,
यह याद आना है।

कुछ बनने की ज़रूरत नहीं,
क्योंकि जो हूँ
वही पर्याप्त है।

अज्ञान कोई वस्तु नहीं,
बस पहचान की भूल है।

जब खोज रुक जाती है,
तब सत्य प्रकट होता है।

इससे जुड़ा लेख पढ़ें:

👉 आत्मविचार क्या है? (About page link)

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shopping Basket
  • Your basket is empty.