इंसान को चेतना मिली है,
पर उसने उसे बाहर खोजने की आदत बना ली।
वह बदलना चाहता है दुनिया को,
पर खुद को देखने से डरता है।
यही डर
उसके विकास की पहली दीवार है।
तकनीक बढ़ी,
पर समझ नहीं।
बुद्धि तेज़ हुई,
पर विवेक सो गया।
इंसान जानता है क्या गलत है,
फिर भी वही करता है—
क्योंकि सुविधा सच्चाई से आसान लगती है।
अहंकार कहता है —
“मैं ठीक हूँ।”
चेतना पूछती है —
“क्या तू सच में जागा है?”
इंसान अहंकार की सुन लेता है,
और जागने का मौका टाल देता है।
विकास बाहर नहीं रुकता,
विकास भीतर रुकता है।
जब इंसान अपने विचारों को
सच मान लेता है,
और देखने वाला बनना भूल जाता है।
जो देख रहा है—
वही चेतना है।
जो लड़ रहा है—
वही अहंकार है।
इंसान अहंकार को बचाने में
अपनी चेतना कुर्बान कर देता है।
निष्कर्ष:
इंसान का विकास किसी ने नहीं रोका।
उसने खुद ही
अपनी आँखें बंद कर लीं।
जब वह देखना शुरू करेगा—
तभी वह सच में विकसित होगा।
