जब जीवन में सुख आता है,
तो वह अपने साथ
दुःख की संभावना भी लाता है।
लेकिन मनुष्य
सुख को स्थायी मान लेता है,
और यहीं से
उसका भ्रम आरंभ होता है।
अद्वैत कहता है—
सुख और दुःख
दोनों ही मन के भाव हैं,
स्वरूप नहीं।
जो आता है,
वह जाता है।
जो बदलता है,
वह तुम नहीं हो।
मनुष्य तब दुखी होता है,
जब वह सुख को पकड़ना चाहता है
और दुःख से भागना चाहता है।
पर जो
सुख और दुःख
दोनों को
समान दूरी से देखता है,
वही साक्षी है।
न सुख उसे उछाल पाता है,
न दुःख उसे तोड़ पाता है।
जहाँ आसक्ति समाप्त होती है,
वहीं पीड़ा का अधिकार भी
समाप्त हो जाता है।
अद्वैत में मुक्ति का अर्थ
कुछ पाना नहीं,
बल्कि
उससे अलग हो जाना है
जो तुम कभी थे ही नहीं।
सुख और दुःख
आते-जाते रहेंगे,
पर तुम—
जो उन्हें देख रहे हो—
सदैव स्थिर हो।
साक्षी बनो—
जीवन स्वयं सरल हो जाता है।
आत्मविचार की मूल समझ के लिए यह लेख उपयोगी हो सकता है।
अद्वैत वेदांत की विस्तृत व्याख्या पारंपरिक ग्रंथों और आधुनिक विद्वानों द्वारा भी की गई है।
